क्या कोरोना अधिक खतरनाक नहीं है ? कोरोना से डरने की जरूरत नही है ।

             

                 
                    कितना खतरनाक है कोरोना?


दुनिया ने कोरोना को सबसे खतरनाक बीमारी की संज्ञा  दी है इसे मौत का सौदागर कहा जा रहा है । पर सच मे कोरोना  खतरनाक इसलिये नही है कि वह लोगों को मौत दे रहा है पर इसलिये वह खतरनाक है कि काफी तेजी से दुनिया मे फैल रहा है। यदि कोरोना मौत के सौदागर होता तो दुनिया की मौत दर  6-7  नही होता ।  यदि हम ठंडे भूक्षेत्र वाले developed  यूरोपियन देशों और अमेरिका को निकाल दे (( चूँकि वहां के लोगों के जीवन शैली पोल्ट्री मुर्गी की तरह होते हैं )) तो यह मौत दर 3 के आसपास चली जायेगी । यदि  कोरोना की  तुलना हम ebola वायरस की मौत दर से करते है तो   यह 20 से 25 गुना  कम है।  तो कैसे हम कोरोना को सबसे खतरनाक वायरस कह सकते  है। हाँ सबसे अधिक खतरनाक इस वजह से है कि इसके फैलने की दर record में आये आज तक कि सभी वायरस के तुलना में सबसे अधिक है।

     चलिए अब हम बात अपनीं भारत   के करते हैं हमारा देश की मृत्यु दर 3 - 3.5 के range में fluctuate करते रहता है ।  यदि हम realistic आँकड़े ले तो यह मृत्यु दर लगभग घटकर 1 - 2 हो जाएगा  क्योंकि बहुत से  ऐसे कोरोना संक्रमित लोग होंगे जिनका जांच भी नही हुआ होगा  ।  suppose  यदि संभव हो और  हम एक साथ पूरे भारत के लोगों को test करे तो हो सकता है कि जो कोरोना के  positive cases के confirm data अभी तक आये है ।  इससे 5 -10 गुना cases अचानक बढ़ जाए  और आश्चर्य की बात यह देखने को मिलेगी की  90 %  ऐसे संक्रमित लोग होंगे जिनमे कोरोना के कोई भी लक्षण नही है और न ही ऐसे लोगों को ठीक होने के लिए दवाईयों की जरूरत है। वे सब अपने आप ठीक हो जाएंगे। पर खतरे की बात यह होगी कि ऐसे लोगों से कोरोना यदि कमजोर immune पावर वाले लोगों के अंदर चला गया तो उन्हें critical होने के chances काफी बढ़  जाता है ।
 
         हमारे देश के वे राज्य जो rapid test without wait and watch के नीति अपना रहा हो वहाँ  maximum वैसे cases आ रहे होंगे जो कोरोना positive तो है पर इसमें कोई भी कोरोना के लक्षण नही है।
  और कुछ ऐसे राज्य  जो wait watch and test के नियम पर काम कर रहा हो वहां कोरोना के मरीज के data कम होंगे। इसका कतई ये मतलब नही है कि वहाँ सिर्फ उतने ही मरीज होंगे जितना टेस्ट करने के बाद positive  निकले है।

 कोरोना मरीजों से जुड़ी मौजूदा  data को analysis करें तो कोरोना वायरस हमारे शरीर के सारे system को प्रभावित नही कर रहा है । खासकर वह हमारे  system के ऐसे अंगों को प्रभावित कर रहा है  जो blood को filter करने के काम आते है जैसे lungs, kidney, liver । इन सब में हमारा lungs सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है । 95% cases lungs से जुड़ी ही आ रहा है । यदि हम कोरोना की तुलना अफ्रीका महादेश में आये इबोला  वायरस से करें तो ebola इसकी तुलना में काफी अधिक खतरनाक था । इबोला तो हमारे शरीर के अधिकांश सिस्टम को प्रभावित किया था जैसे digestive system, circulatery system,  respiratory system, muscular system आदि। इसलिए ebola के मरीज को मांसपेशियों में दर्द होना , उल्टी-दस्त,सिरदर्द, बुखार, रक्तस्त्राव, आँखों का लाल होना, गले में परेशानी आदि लक्षण दिखाई देते थे। पर कोरोना के case में वही अंग infected हो रहा है जो blood को फ़िल्टर कर रहा है।   सच कहे तो कोरोना हमारे blood cells पर हमला कर रहा है पर इसे मार नही रहा यदि इसके हमले से हमारे blood cells मरते तो मरीज़ो में heart से जुड़ी समस्या के case आने चाहिए था ।  या उसे कमजोरी, चक्कर आना, blood pressure से जुड़ी समस्या आदि  होना चाहिए था । पर दुनिया के डॉक्टर maximum case में  सिर्फ pneumonia( lungs से जुड़ी समस्या) के होने की बात कर रहे है।
    जब मैं google से कोरोना  how cause  lungs problem की जानकारियां collect कर रहा था तो मुझे कुछ ऐसी आँकड़े मिले की कोरोना attack के कारण lungs में mucus बनने लगता है जिसके कारण वायुकोष jam हो जाता है या हमारे throat के पास mucus बनते है जो श्वासनली से होकर हमारे फेफड़े में चला जाता है और फेफड़े को जाम कर देता है और श्वास के अभाव में death हो जाता है।
       पर मैं इस research से सहमत नही हूँ। जब कोरोना की संख्या हमारे वायुकोष में बढ़ने लगती है तो हमारे lungs को सामान्य रूप से काम करने में दिक्कत आने लगती है हमारे शरीर को लगता है कि इससे वायुकोष jam हो सकता है चूँकि हमारे फेफड़े से वही कण बाहर या अंदर आ सकते है जिसका size O2(0.3nm) & CO2(0.25 nm) के समान हो । प्रकृति ने हमारा वायुकोष के छिद्र को इन गैसों की जरूरतों के अनुसार design किया है। पर कोरोना के size लगभग 60 nm के होते है जो कि बड़े है । वायुकोष को जाम होने से बचाने के लिए हमारा शरीर इसे बाहर निकालना चाहता है चूँकि यह छिद्र के सामान्य अवस्था में नही निकल सकता इसलिये  हमारा शरीर इसे high air pressure ( खाँसी ) की मदद से वायुकोष की छिद्र को बढ़ाता है और बाहर करता है। यह प्रक्रिया बार बार होने के कारण soft muscle tissue से बने वायुकोष में घर्षण होने लगती है जिसके कारण वहाँ सूजन ( फूल जाना) हो जाता है और छिद्र जाम हो जाता है
इसलिए ऐसी स्थिति में हम जब साँस लेते है तो सीने में दर्द होने लगता है और श्वास को जोर से अंदर खीचना पड़ता है मानो हाफ़ रहे है। इस सूजन पर काबू ना पाया जाय तो मरीज की जान भी जा सकती है।

   कोई जीव किसी पर्यावरण में कितना दिनों तक रहता है यह इस बात पर  भी निर्भर करता है है कि वह उस पर्यावरण में कैसा feel कर रहा है । उसके लिए ये जगह कितनी अनुकूल है । यदि कोरोना हमारे शरीर मे रहने आया है तो क्या उसे वैसा environment मिला है कि वह वहाँ आराम से स्थायी रूप से रह सकता है । यदि कोरोना से मानव की मौत हो रहा है तो शरीर के अंदर रह रहे कोरोना की भी मौत हो रही है । यह डर सिर्फ मानव में ही नही है बल्कि कोरोना समुदाय में भी है और  वह वहाँ नही रहना चाहेगा  जहाँ उसे ecofriendly environment  न मिले । धीरे धीरे वह कमजोर हो जाएगा। और हमारा शरीर dominate कर खत्म कर देगा। पर ऐसा 5-10 दिनों में नही होगा। हो सकता है।  ऐसा होने के लिए 4 - 6 महीने लग जाय या इससे  अधिक  समय भी। यह इस बात पर निर्भर करता है कि यह सूक्ष्मजीव कितना घातक और उसे भी कितनी परेशानी झेलना पड़ रहा है।
   

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